Sunday, September 5, 2010

स्क्रीन प्रिंटिंग इस क्षेत्र के मुख्य प्रदूषक हैं, तो फिर सांगानेरी हैण्ड ब्लॉक प्रिंट को क्यों दंडित किया जाना चाहिए ?

द्रव्यवती नदी, उर्फ अमानी शाह का नाला में डाई वेस्ट वॉटर क्या आप जानते हैं जान लेवा बन रहा है पानी

कभी यह नदी जयपुर की जीवनरेखा थी। लेकिन आज गन्दा नाला है जिसमे आधे जयपुर का मलमूत्र और विश्वकर्मा,झोटवारा,करतारपुरा,सुदर्शनपुरा,मानसरोवर ओद्योगिक क्षेत्रो के साथ ही डालडा फेक्ट्री का भी पानी भी इसी नाले में आता है लेकिन श्री विजय सिंह पुनिया, राजस्थान प्रदुषण नियंत्रण मंडल एवं राजस्थान सरकार को सिर्फ सांगानेर का छपाई एवं रंगाई उद्योग ही नाले में दूषित पानी छोड़ने के लिये दोषी नज़र आया जिसके परिणाम स्वरुप आज विदेशी मुद्रा अर्जित करने वाले एवं तीन लाख लोगो को रोजगार देने वाले 500 वर्ष पुराने औद्योगिक शहर पर गाज गिरने की नोबत आ गई है।


सांगानेर गांव के पुराने छपाई वाले बताते हैं कि इस नदी का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। कच्चा बंधा, रावल जी का बंधा, हाथी बाबू का बांध, ख्वास जी का बांध, गूलर बांध एवं रामचन्द्रपुरा का बांध सिंचाई के मकसद से ही बनाए गए।



नदी के क्षेत्रफल को परिभाषित करने वाले नदी के किनारों पर पिलर लगा दिए गए और सरकार ने आदेश जारी किए कि इस क्षेत्र के अंदर कोई भी निर्माण अवैध माना जाएगा। परन्तु सरकार एवं उसके विभिन्न विभागों तथा निकायों द्वारा इस नदी के संरक्षण संवर्धन के नाम पर जो प्लान बनाये गए है , उनमें भारी अनियमितताओं को देख कर लगता है कि ''सरकार स्वयं ही इस नदी को नाले में तब्दील करने पर अमादा है



सांगानेर स्थित रंगाई-छपाई की टेक्सटाइल इंडस्ट्रीज में कपड़ों को रंगने की प्रक्रिया में लाखों लीटर पानी प्रयोग किया जाता है। यूनिटों से रोजाना लाखों लीटर डाई वेस्ट वॉटर निकलकर अमानीशाह नाले या सड़क किनारे फैल रहा है। इनसे निकलने वाले प्रदूषित जल से न केवल जल प्रदूषण, बल्कि वायु प्रदूषण भी हो रहा है। इतना ही नहीं इन इकाइयों से निकलने वाला पानी जहां से होकर गुजर रहा है, वहां की जमीन की उपज क्षमता कम हो रही है। ऎसे में काफी समय से इस प्रदूषण को खत्म करने की मांग चली आ रही है। सांगानेर, मुहाना मोड़, बालावाला व आस-पास के इलाकों में स्थित रंगाई-छपाई के कारखानों का केमिकल युक्त पानी कुछ ही दिनों में लोहे को भी गलाने की क्षमता रखता है।



इस पानी में बीओडी, सीओडी, टीडीएस और टीएसएस जैसे हारिकारक कैमिकल और कई हैवी मैटल्स हैं। यह न सिर्फ पर्यावरण, कृषि और पशु-पक्षियों के लिए नुकसानदायक है, बल्कि आसपास के खेतों में होने वाली फसलों का सेवन करने वालों में इससे गम्भीर बीमारियां भी हो रही हैं।



ट्रीटमेंट प्लांट नहीं होने से रंगाई-छपाई के बाद बहने वाला पानी पेड़-पौधों, जीव-जंतुओं के लिए खतरनाक साबित हो रहा है। इससे भी बड़ा खतरा इस पानी के उपयोग से पैदा होने वाले फल-सब्जी तथा फसलों के उपयोग से होने वाले विभिन्न जानलेवा रोग हैं।



पानी की कमी और प्रदूषण के कारण भूजल में फ्लोराइड की मात्रा काफी बढ़ गई है, हैपेटाइटिस-ई जो दूषित जल से फैलता है, जिसके कारण लोगों के हाथ-पैर टेढ़े हो गए हैं। व्यक्ति पर 40 की उम्र में ही 60 जैसा असर दिखने लगता है। फ्लोराइड का असर दांतों पर ही नहीं पूरे शरीर पर पड़ता है।



सरकार की ढिलाई से सांगानेरी प्रिंट उद्योग पर संकट खड़ा हो गया है।



पर्यावरण मापदंडों पर खरा नहीं उतरने के कारण प्रदूषण नियंत्रण मंडल ने 750 रंगाई-छपाई फैक्ट्री मालिकों को फैक्ट्री बंद करने के नोटिस जारी कर दिये है। बिजली कंपनी एवं जलदाय विभाग को इन फैक्ट्रियों के बिजली—पानी के कनेक्शन काटने को कहा गया है। मंडल ने जिला कलेक्टर को फैक्ट्री बंद नहीं करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई को भी लिख दिया है।



इन इकाइयों में दुनिया भर में प्रसिद्ध सांगोनरी छपाई व रंगाई का काम किया जाता है। सांगानेरी प्रिंट का उपयोग बेडशीट बनाने के साथ गारमेंट में होता है। इनका सालाना कारोबार लगभग सात सौ करोड़ रुपये हैं, जबकि सालाना तीन सौ करोड़ रुपये की सांगानेरी प्रिंट बेडशीट और गारमेंट का निर्यात किए जा रहे हैं।



इकाइयों को बंद करने के नोटिस पर अब अमेरिका, इंग्लैंड में भी चिंता महसूस की जा रही है। इन देशों में रहने वाले आयातक राजस्थानी प्रदेश की शान माने जाने वाले जयपुर के इस उद्योग पर आए संकट से आहत हैं।



सुप्रीम कोर्ट का फैसला हक में आने के बावजूद सांगनेर में लगी रंगाई-छपाई इकाइयां मुश्किल दौर से गुजर रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2009 में सांगानेर की इकाइयों के हक में फैसला सुना दिया था और इकाइयों से निकलने वाले गंदे पानी के लिए ट्रीटमेंट प्लांट लगाने के निर्देश दिए थे। इन इकाइयों से निकलने वाले प्रदूषित पानी के लिए सांगानेर में दो प्लांट लगाना तय किया है।



इन प्लांटों पर कुल 46 करोड़ रुपये की लागत आने का अनुमान है। इस लागत की 75 फीसदी राशि केंद्र सरकार और 10 फीसदी राशि राज्य सरकार को वहन करनी है। शेष राशि उद्यमियों को लगानी है। यह प्लांट लगने के बाद ही सांगानेर की इकाइयों को भू उपयोग बदलने की अनुमति मिलनी है। लेकिन उद्यमियों की तमाम कोशिशों के बावजूद न तो ट्रीटमेंट प्लांट लग पाया है और ना ही भू उपयोग बदलने की अनुमति मिल सकी है। इसके चलते सांगानेर की इकाइयों की मुश्किलें बढ़ती जा रही है।



पिछले वर्ष दुनिया भर में आर्थिक सुस्ती की वजह से निर्यात और घरेलु कारोबार प्रभावित होने से सांगानेर स्थित इकाइयों की वित्तीय हालात खराब हो गई है, जबकि औद्योगिक भूमि में नहीं होने से इन इकाइयों को बैंकों से लोन भी नहीं मिल पा रहा है। उद्यमी लगातार सरकार को समस्याओं से अवगत करा रहे हैं। लेकिन जयपुर विकास प्राधिकरण व उद्योग विभाग के ढीले रवैये के कारण इन इकाइयों को भू उपयोग बदलने की अनुमति नहीं मिल सकी है। अब यह दोनो विभाग यह कह रहे हैं, कि जब तक ट्रीटमेंट प्लांट नहीं लग जाता है भू उपयोग बदलने की अनुमति नहीं मिल सकती।



अब अंडरटेकिंग का ही सहारा



पर्यावरण मापदंडों पर खरा नहीं उतरने के कारण प्रदूषण नियंत्रण मंडल ने 750 रंगाई-छपाई फैक्ट्री मालिकों को फैक्ट्री बंद करने की अब तक सबसे बड़ी कार्यवाही के बाद उद्योग ने 14 महीने का समय माँगा है । इसके लिए उद्यमियों से मंडल द्वारा व्यक्तिगत अंडरटेकिंग मांगी जा रही है । इसके बावजूद विद्युत विभाग ने 15 दिन में विद्युत सम्बन्ध विच्छेद करने के आदेश पारित कर दिए है । इस प्रकार की दोहरी नीतियाँ दर्शाती है की सरकार की मंशा में खोट है वो इस बहाने अपने वोट बैंक को भी बचाके रखना चाहती है और मंडल को उद्यमियों की सम्पूर्ण सूची भी उपलब्ध करना चाहती है तथा यूँ भी कह सकते है कि इस सबके पीछे विदेशी हाथ भी हो सकते है जो सरकार के साथ मिलकर इस उद्योग को बंद कर यंहा पर सस्ती दरो में कमर्शियल उपयोग के लिए जमीने लेना चाहते हों ।



एकता के अभाव में टाइम पास प्रोग्राम



जानकारों का मानना है कि अंडरटेकिंग देना रंगाई - छपाई से जुड़े उद्यमियों का टाइम पास प्रोग्राम का एक और चरण है क्योंकि न तो उद्यमी एक मंच पर इकट्ठे होंगे और न ही प्लांट के लिये धन इकठ्ठा होगा। क्योंकि कोई भी उधमी इस संकट को गंभीरता से नहीं ले रहा है चाहे वो धुलाईवाला है छपाईवाला है या रंगाईवाला है सबका कहना है कि जो सबके साथ होगा वो हम भी भुगत लेंगे। कहने का अभिप्राय यह है कि एकता के अभाव तथा कुछ लोगो के स्वार्थ के कारन तीन लाख लोगो के स्वरोजगार के साथ कुठाराघात हो रहा है जिसमे सबसे ज्यादा उन लोगो का मरण है जो किराये के कारखानों में अपनी इकाई चलाते है एवं आर्थिक कमजोर है। हो सकता है एकबारगी जो लोग धनाढ्य वो तो अपने आप को अन्यत्र स्थापित कर सकते है लेकिन गरीबों का कोन धणी होगा इसका उत्तर किसी के पास नहीं है।


हमारा कसूर क्या है ? हम कोशिश तो कर रहे है


सरकार इस मसले पर खुद ही गंभीर नहीं है और अपनी ढिलाई का ठीकरा रंगाई - छपाई व धुलाई वालीं के सर फोड़ना चाहती है । ट्रीटमेंट संयत्र कि फिजिबिलिटी के मसले पर सुप्रीम कोर्ट में प्रदुषण मंडल और सरकार ने ही अपनी सहमती दी थी, उसी के आधार पर 30 अप्रेल 2009 को फैसला हुआ, तीन साल का समय मिला लेकिन इस समय में न तो उद्यमियों और न ही सरकार कि तरफ से कोई त्वरित और ठोस कार्यवाही हुई जिसका नतीजा है कि आज उपक्रम बंद करने कि नोबत आ गई है जिससे कुल मिलाकर यह है कि तीन लाख लोगो कि रोजी रोटी पर बन आई है



पारम्परिक अद्वितीय सांगानेरी ब्लॉक प्रिंट के लिए भी खतरा



हाथ ब्लॉक छपाई भारत में सदियों पुरानी परंपरा है.लगभग 500 वर्ष पुराना है,



हाथ ब्लॉक छपाई शिल्प एक विरासत के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है.


हाथ ब्लॉक छपाई में सीमित उत्पादन और गहन मानव इनपुट है,



सीमित पानी,, प्राकृतिक रंजक के साथ बना, सांगानेरी हैण्ड ब्लॉक प्रिंटेड एक ब्रांड नाम हैं, परंपरागत शैली के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता है.



हैण्ड ब्लॉक प्रिंट से सांगानेर में कार्यरत 350 इकाइयाँ लगभग 3000 परिवारों को रोजगार प्रदान करती हैं.20,000 लोग इस शिल्प पर अपनी आजीविका के लिए निर्भर है.



सांगानेरी ब्लॉक प्रिंट में सीमित पानी की आवश्यकता होती है, प्रदूषण प्रबंधनीय सीमा के भीतर है. "Azo मुक्त रसायनों का प्रयोग, प्राकृतिक रंजक, यह पर्यावरण के अनुकूल है.



स्क्रीन प्रिंटिंग इस क्षेत्र के मुख्य प्रदूषक हैं, तो फिर सांगानेरी हैण्ड ब्लॉक प्रिंट को क्यों दंडित किया जाना चाहिए ?

Brij Ballabh Udaiwal
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