Thursday, September 2, 2010

द्रव्यवती नदी, उर्फ अमानी शाह का नाला

कभी यह नदी जयपुर की जीवनरेखा थी। जयपुर शहर के उत्तर-पश्चिम से निकलकर पश्चिम-दक्षिण होती हुई, ढूण्ड नदी में मिलने वाली, द्रव्यवती नदी, उर्फ अमानी शाह का नाला, जयपुर शहर की जीवनरेखा रही है। सर्वे ऑफ इंडिया द्वारा प्रकाशित सन् 1865-66 के नक्शों में भी इस नदी को साफ तौर पर दर्शाया गया है। उसके बाद भी सर्वे ऑफ इंडिया द्वारा प्रकाशित नक्शों में नदी साफ तौर पर चिन्हित है। यदि नदी कहीं नहीं है, तो राजस्थान सरकार के राजस्व विभाग के रिकार्ड में।
देखने में यह आया कि पानी की कमी और प्रदूषण के कारण भूजल में फ्लोराइड की मात्रा काफी बढ़ गई है, जिसके कारण लोगों के हाथ-पैर टेढ़े हो गए हैं।
मजे की बात यह रही कि सरकार आंकड़ों से भी द्रव्यवती नदी का नाम गायब होने लगा था। 1981 के एक सर्वे में बाकायदा इस नदी का नाम अमानीशाह नाला रख दिया गया। अमानीशाह नाले को सरकार नदी के रूप में स्वीकार करे और नदी का एक मानचित्रीकरण हो ताकि इसके पेटे में आवासीय कॉलोनियां और बस्तियों को बसने से रोका जा सके। सरकार ने इसके लिए एक प्लान बनाया। नदी का सर्वे करके और पुराने आंकड़ों के आधार पर चिन्हीकरण हुआ। नदी के क्षेत्रफल को परिभाषित करने वाले नदी के किनारों पर पिलर लगा दिए गए और सरकार ने आदेश जारी किए कि इस क्षेत्र के अंदर कोई भी निर्माण अवैध माना जाएगा।
फरवरी 2007 में सरकार ने दुबारा फिर सर्वे किया है और नदी की चौड़ाई सरकार ने काफी कम कर दी है। यह सारा काम भू-माफियाओं के दबाव में किया जा रहा है। भू-माफिया और रीयल एस्टेट बिल्डर्स नदी के पेटे और खादर क्षेत्र में निर्माण काम कर रहे हैं, जो सरकार पर दबाव बनाकर के नदी की चौड़ाई कम कराने में सफल रहे हैं।
सरकार एवं उसके विभिन्न विभागों तथा निकायों द्वारा इस नदी के संरक्षण संवर्धन के नाम पर जो प्लान बनाये, उनमें भारी अनियमितताओं को देख लगता है कि ''सरकार स्वयं ही इस नदी को नाले में तब्दील करने पर अमादा है

द्रव्यवती नदी के किनारे पुराने रजवाड़ों का बंगला, बोट हाउस के साथ ही नदी पर बने कई बांध और बांध से निकली नदियां गवाह हैं कि द्रव्यवती नदी सदानीरा हुआ करती थी।
नदियों के मामले में सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि केंद्रीय जल आयोग की परिभाषाओं में सिर्फ बड़ी नदियां ही नदी मानीं जाती हैं। केंद्रीय जल आयोग ने राजस्थान में सिर्फ चम्बल को ही नदी के रूप में चिन्हित कर रखा है। हजारों छोटी नदियों के संबंध में कोई भी आयोग, बोर्ड, कमीशन कुछ भी नहीं है। राजस्थान में बीकानेर और चुरू को छोड़कर कोई ऐसा जिला नहीं है जहां नदियां न हों। हमें इन छोटी नदियों को जिंदा रखना होगा। जिन्दा इसलिए भी रखना होगा कि ये नदियां सिर्फ पानी का प्रवाह ही नहीं करतीं, बल्कि भूमिगत धाराओं को भी जिंदा करती हैं। अगर ये छोटी नदियां मरती हैं तो भूमिगत धाराएं भी मर जाएंगी। छोटी नदियों का दोहरा महत्व है। जमीन के नीचे की धारा को जिंदा रखने के लिए ऊपर की धारा जिंदा होनी चाहिए। ग्लोबल वार्मिंग की स्थिति में जब मौसम अनियमित हो जाएगा। अत्यधिक वर्षा, अत्यधिक सूखा, अत्यधिक तूफान इन सबमें छोटी नदियाें की जरूरत होगी। अधिक वर्षा की स्थिति में ये छोटी नदियां बाढ़ के पानी को बहाकर नीचे ले जाएंगी और सूखे की स्थिति में जमीन की नमी बनाए रखने में योगदान करेंगी। जमीन की नमी से ही पेड़-पौधाें का जीवन है। पेड़-पौधों से ही पर्यावरण और पर्यावरण, वन्य जीवन, प्रकृति, मानव अस्तित्व संभव है। बाड़मेर में आई बाढ़ इसका ज्वलंत उदाहरण है। बाड़मेर की कवास नदी जो पूरी तरह मर चुकी है और उसके पेटे में आवासीय कॉलोनियां बस गई हैं, यही वजह हुई कि थोड़ा भी ज्यादा पानी बरसा तो पूरा बाड़मेर डूब गया।
जमीन की यह भूख क्यों है? क्या जनसंख्या वृध्दि ही मुख्य कारण है? पर मैं तो इससे बड़ा कारण शहरी भूमि हदबंदी सीमा का खत्म होना मानता हूं। पहले जयपुर में मात्र 500 वर्ग मीटर अधिकतम भूमि सीमा था। इससे ज्यादा जमीन कोई नहीं रख सकता था, पर अब तो जयपुर विकास प्राधिकरण ही 1500 वर्ग मीटर के प्लॉट बेच रहा है। पहले लोग शेयर और गोल्ड में निवेश करते थे, अब तो भूमि में कर रहे हैं। परिणाम सामने है कि पूरा देश रीयल एस्टेट के रूप में विकसित होने की दिशा में बन गया है।

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