Source: बिजनेस भास्कर जयपु | Last Updated 00:52(04/02/10)
सुप्रीम कोर्ट का फैसला हक में आने के बावजूद सांगनेर में लगी रंगाई-छपाई इकाइयां मुश्किल दौर से गुजर रही हैं। सरकार ने इन इकाइयों को अब तक भू उपयोग बदलने की अनुमति नहीं दी है। इस कारण इन इकाइयों को वित्तीय जरूरत पूरी करने के लिए बैंकों से ऋण भी नहीं मिल पा रहा है। उल्लेखनीय है कि सागांनेरी प्रिंट इकाइयां चलाने वाले उद्यमियों ने वाटर ट्रीटमेंट प्लांट लगाने लिए तीन महीने पहले फाइल बनाकर जयपुर विकास प्राधिकरण को सौंप दी थी, लेकिन तीन महीने से यह फाइल दो विभागों के बीच फुटबाल बनी हुई है।
सांगानेर कपड़ा रंगाई-छपाई एसोसिएशन के महासचिव राजेंद्र जिनगर ने बताया कि करीब 15 वर्ष पहले प्रदूषित पानी निकलने की समस्या को लेकर एक जनहित याचिका दायर की गई थी। करीब नौ वर्ष तक यह मामला राजस्थान हाईकोर्ट में चला और हाई कोर्ट ने इन इकाइयों के खिलाफ फैसला सुना दिया था, लेकिन उद्यमियों ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील कर दी थी। इसकी सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2009 में सांगानेर की इकाइयों के हक में फैसला सुना दिया था और इकाइयों से निकलने वाले गंदे पानी के लिए ट्रीटमेंट प्लांट लगाने के निर्देश दिए थे। इन इकाइयों से निकलने वाले प्रदूषित पानी के लिए सांगानेर में दो प्लांट लगाना तय किया है।
इन प्लांटों पर कुल 33 करोड़ रुपये की लागत आने का अनुमान है। इस लागत की 75 फीसदी राशि केंद्र सरकार और 10 फीसदी राशि राज्य सरकार को वहन करनी है। शेष राशि उद्यमियों को लगानी है। यह प्लांट लगने के बाद ही सांगानेर की इकाइयों को भू उपयोग बदलने की अनुमति मिलनी है। लेकिन उद्यमियों की तमाम कोशिशों के बावजूद न तो ट्रीटमेंट प्लांट लग पाया है और ना ही भू उपयोग बदलने की अनुमति मिल सकी है। इसके चलते सांगानेर की इकाइयों की मुश्किलें बढ़ती जा रही है। उन्होंने बताया कि इन इकाइयों में दुनिया भर में प्रसिद्ध सांगोनरी प्रिंट की छपाई व रंगाई का काम किया जाता है। सांगानेरी प्रिंट कपड़े का उपयोग बेड शीट बनाने के साथ गारमेंट में भी होता है।
इनका कुल कारोबार सालाना लगभग सात सौ करोड़ रुपये हैं, जबकि तीन सौ करोड़ मूल्य की सांगानेरी प्रिंट बेड शीट और गारमेंट का निर्यात किया जा रहा है। लेकिन पिछले वर्ष दुनिया भर में आर्थिक सुस्ती की वजह से निर्यात और घरलू कारोबार प्रभावित होने से सांगानेर स्थित इकाइयों की वित्तीय हालात खराब हो गई है, जबकि औद्योगिक भूमि में नहीं होने से इन इकाइयों को बैंकों से लोन भी नहीं मिल पा रहा है। उन्होंने बताया कि उद्यमी लगातार सरकार को समस्याओं से अवगत करा रहे हैं।
लेकिन जयपुर विकास प्राधिकरण व उद्योग विभाग के ढीले रवैये के कारण इन इकाइयों को भू उपयोग बदलने की अनुमति नहीं मिल सकी है। अब यह दोनो विभाग यह कह रहे हैं, कि जब तक ट्रीटमेंट प्लांट नहीं लग जाता है भू उपयोग बदलने की अनुमति नहीं मिलेगे। दूसरी तरफ ट्रीटमेंट प्लांट लगाने के लिए आई.आई.एल.एफ वाटर लिमिटेड ने सर्वे का काम पूरा कर लिया है। यह अपनी रिपोर्ट इसी महीने सौंप देगी।
फिर भी सरकार के मौजूदा रवैये को देखते ट्रीटमेंट प्लांट लगने में डेढ़ वर्ष का समय लगने का अनुमान है। इस वजह से यह उद्यमी चिंता में घिर हुए हैं।
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